*संताप
*----------------------------------------------------------------- हा
नसे अभ्यास आणि हा नसे आनंदही,
गीत हा संताप माझा आतला
आवाजही.... कैकदा प्रत्येकवेळा
मी जरी नाकारले, गीत आहे प्राण
माझा घेतलेला श्वासही...
भोगलेले शाप होते कोठले कधीचे,
लेखणी उ:शाप आहे आसरा आधारही...
कल्पनेला साद देण्या शब्द
वेडे धावले, दूर गेले स्वप्न
झाले पोरके आभासही... मीच माझा
डाव येथे खेळलो होतो ईमाने,
हारलो सारेच आता घेतलेला
शापही.....
--------------------------------------------------------नचिकेत
भिंगार्डे
'सुरेशभट.इन'वरील दुवा:
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Thursday, March 4, 2010
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